Saturday, 8 September 2007

दिमागों से हटे अब ये धुंधलका ,
बहुत इसरार है यारो ग़ज़ल का !

कोई कैसे बचे परछाईयों से ,
हमारा आज है मोहताज कल का !

जरा ऊंचाईयों से देख लीजे
ये बौनापन भी राजा के महल का !

चलो हम तुम चलें ऐसी जगह अब ,
जहाँ पर खत्म हो अहसास पल का !

ब्रजेश शर्मा