Monday, 3 September 2007

हम लेके रंग ओ नूर का इक कारवां चले ,
कलियाँ चलीं शिगूफे चले गुलसितां चले !
चलती है तेरी याद गमे दिल के साथ साथ ,
कातिल के साथ जैसे कोई मेहरबाँ चले !
हमने गुलाल मल दिया रुखसारे शाम पर ,
ये दास्ताँ चले न चले पर निशां चले !
हम दौरे इन्कलाब समझते हैं उसको "सोम ",
खाके ज़मीं के साथ अगर कहकशां चले !

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