Thursday, 13 September 2007

ग़ज़ल

बड़ी मुश्किल है यारो ज़हनियत भी ,
नहीं मिल पाते अपने आप से भी !

अजब ये दौर है सब खौफ में हैं ,
कली और फूल क्या पिस्तोल तक भी !

वो एक चेहरा जो मेरे ख्वाब में है ,
कभी आएगा आख़िर सामने भी !

चलोगे जब मोहब्बत के सफ़र पर ,
तुम्हें अपना लगेगा अजनबी भी !

हुनर अहसास पर हावी हुआ ग़र ,
तो फिर दम तोड़ देगी शायरी भी !

डॉ.ब्रजेश शर्मा