Friday, 7 September 2007

तमाम तोहमतें दुनियां कि वो उठाएगा ,
अजब दीवाना है अपनी ही बात मानेगा !

तेरी वफ़ा ये तेरा ऐतबार , तेरा खुलूस ,
गुनाह से तो यक़ीनन मुझे बचा लेगा !

मेरे तमाम गुनाहों का चश्मदीद गवाह ,
मेरा ज़मीर ही मुंसिफ है , फैसला देगा !

मेरा मिजाज़ फ़कत उलझनों का मेला है ,
वो मुझ से रब्त बढ़ाकर भी और क्या लेगा !

रूह अल्फाज़ की मेरे बयान में झलके ,
मेरी ज़ुबान में कब ये शऊर आएगा !

ब्रजेश शर्मा