ओ री ओ ब्रज रज होँ चाहत तिहारे संग
प्रेम के प्रसंगन में पुलक पसीजबो ,
बोरि रस रंगन में हरत हमारो हियो ,
कुंजन को मान खोरि खेलन में खीजबो !
मुकति न दीजो जग जुगति न दीजो कछू ,
दीजियो न छूछें छल छंदन में छीजिबो,
दीजियो सलोनी श्याम सूरत पे रीझिबोई,
राधिका सनेह कि फुहारन में भीजिंबो !
"कवि श्री सोम ठाकुर "
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