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ग्वाल जुरे सब खेलन कों ,अरु चंद्र प्रभा को चहुंदिसी फेरो ,
चाहत तू ब्रज की गलियान में ,जावों अबेई तजि गौहन तेरो
एक यहै दुबिधा मन मांही ,कहां पैहों दुरिबो कों अंधेरो ,
जात जहाँ तहं राधिका संग ,तहीं बिनु दीप के होत उजेरो
" कवि सोम ठाकुर "