Friday, 7 September 2007

आंखों में नीला आकाश , पैरों में बेड़ियाँ पड़ी !
कैसी संत्रास कि घड़ी !

उड़ने को पंख हैं मगर , उड़ना निषेध हो गया ,
साँसों में ऋतु बसंत का , रहना अवैध हो गया !
बेला कि कलियाँ रक्खी , सोने के फ्रेम में जड़ी !
कैसी संत्रास कि घड़ी !

होंठ जरा गुनगुना लिए , कैसा कोहराम मच गया ,
धड़कने धड़क गयी जरा, सन्नाटा ऐक खिंच गया !
कटघरे में कर दिया खड़ा , तोहमतें लगीं बड़ी बड़ी !
कैसी संत्रास कि घड़ी !

देवी है या दासी है , तीसरा विकल्प ही नहीं ,
मानवी के स्वाभिमान का, कोई संकल्प ही नहीं !
मीरा को मौत कि सजा , हर युग में झेलनी पड़ी !
कैसी संत्रास कि घड़ी !
डॉ. कीर्ति काळे