Sunday, 9 September 2007

ऐसा क्यूँकर लगता है ,
बिला वज़ह डर लगता है !

इश्क में आँखें छलकें तो ,
अश्क समंदर लगता है !

उलझन का तानाबाना ,
बस अपना घर लगता है !

उसने दर्द कुबूल लिए ,
मस्त कलंदर लगता है !

ब्रजेश शर्मा