मैं तुम्हें पहचानता हूँ !
पूर्व परिचय भी नहीं था , आज भी हम हैं अपरिचित !
ये अछूते अधर अपनी मूकता में ही प्रकम्पित !
किन्तु जब देखा तुम्हें तो चेतना ने यह बताया ,
हाय खोई वस्तु मैं कितने दिनों में खोज पाया !
तुम न मानो ! जग न माने ! किन्तु मन तो कह रह है ,
मैं तुम्हें पहचानता हूँ !
श्री शिव मंगल सिंह " सुमन "