Wednesday, 2 January 2008

मैं तुम्हें पहचानता हूँ !

पूर्व परिचय भी नहीं था , आज भी हम हैं अपरिचित !
ये अछूते अधर अपनी मूकता में ही प्रकम्पित !

किन्तु जब देखा तुम्हें तो चेतना ने यह बताया ,

हाय खोई वस्तु मैं कितने दिनों में खोज पाया !

तुम न मानो ! जग न माने ! किन्तु मन तो कह रह है ,

मैं तुम्हें पहचानता हूँ !

श्री शिव मंगल सिंह " सुमन "