Friday, 11 January 2008

सरिता ............


निरंतर चल रही हूँ मैं ,
जहाँ जैसी मिली राहें
उन्हीं में ढल रही हूँ मैं !
निरंतर चल रही हूँ मैं !
किसी पर्वत के अंतर में ,छिपी बन नीर का सोता ,
मिली जो संधि पत्थर में , वहीं उदगम मेरा होता ,
उछालती चल पड़ी नीचे , बढ़ाया वेग बन झरना ,
मुझे आगे बहुत प्यासी धरा का ताप है हरना ,
मेरी गति है मेरा शोधन
तभी निर्मल रही हूँ मैं!
कहीं ऊँचा ,कहीं नीचा ,मेरा पथ है बड़ा दुर्गम ,
कहीं पाषाण खंडों ने ,लिए अवरोध के परचम ,
कहीं मिलती धरा बंजर , कहीं फैले हुए जंगल ,
कभी मैं गाँव से गुजरी , कहीं मीलों मिले जंगल ,
धरा कि गोद में गिरती
संभलती पल रही हूँ में !
मिलें अवरोध कितने ही , मुझे रुकना नहीं आता,
किसी पत्थर के क़दमों में मुझे झुकना नहीं आता ,
नुकीले पत्थरों को मैं , सुघर शिवलिंग बनाती हूँ ,
अकेली राह चलती हूँ , मैं छल छल गुनगुनाती हूँ ,
कभी गंभीर हो रहती ,
कभी चंचल रही हूँ मैं !
मेरा तो धर्म है धरती के जीवन को ही सरसाना ,
जहाँ होकर निकल जाऊँ , वहीं आनंद बरसाना ,
कहीं नन्हा कोई अंकुर कि कोई पेड़ हो वट का ,
कोई पशु हो कि पंछी हो, मुसाफिर हो कोई भटका ,
सभी कि प्यास समता से
बुझाती चल रही हूँ मैं !
अभी तो दूर है मंजिल , जहाँ मुझको पहुंचना है ,
जहाँ जाकर मुझे सागर की बाँहों में सिमटना है ,
उसी विस्तार में खोकर , उसी का अंग बन जाऊँ ,
उसी का रूप ले लूँ मैं , उसी का रंग मैं पाऊँ ,
मैं सरिता हूँ समंदर के
लिए बेकल रही हूँ मैं !
मेरा तो धर्म है बहना
अनवरत बह रही हूँ मैं !
निरंतर चल रही हूँ मैं , निरंतर चल रही हूँ मैं !
--- सरिता शर्मा