Wednesday, 2 January 2008

ग़ज़ल

समंदर के तमाशाई हैं मंज़र देखने वाले ,
समंदर में तो उतरेंगे समंदर देखने वाले !

यही अंजाम है इनका , यही इनका मुकद्दर है ,
बुझे जाते अपने आप , जलकर देखने वाले !

लकीरें कुछ बतातीं हैं , नतीजा कुछ निकलता है ,
बड़े हैरान हैं मेरा मुकद्दर देखने वाले !

मदन मोहन दानिश