Wednesday, 19 December 2007

ग़ज़ल

हमें मालूम है मय इसमे है बस नाम को यारो ,
दिया साकी ने तो सर से लगाया जाम को यारो !

यहाँ जिस काम को आये हैं कर लें लौट जायेंगे ,
हमें आती है घर की याद बेहद शाम को यारो !

किसी की गोद में थक कर नशे की नींद में सोयें ,
फ़रिश्ते तक तरसते हैं इसी आराम को यारो !

मुनासिब है सज़ा दो सख्त से भी सख्त ज़ालिम को ,
मगर खुद याद रखना ज़ुल्म के अंजाम को यारो !

मोहब्बत के अलावा और भी कोई इबादत है ?
ज़ेहन से तुम मिटादो इस खयाले खाम को यारो !

* श्री उदय प्रताप सिंह