Friday, 31 August 2007

इस सदन में, मैं अकेला ही दिया हूँ ,
मत बुझाओ जब मिलेगी रौशनी मुझ से मिलेगी


जी रहे हो जिस कला का नाम लेकर ,
कुछ पता भी है कि वह कैसे बची है ,
सभ्यता कि जिस अटारी पर खड़े हो ,
वो हमीं बदनाम लोगों ने रची है .

1 comment:

Anonymous said...

vaah kya baat hai dr brijesh jee- brijenda s.