जिसे दुश्मन समझता हूँ ,वही अपना निकलता है !
हर एक पत्थर से मेरे सर का ,कुछ रिश्ता निकलता है !!
डरा धमका के तुम हमसे वफ़ा करने को कहते हो !
कहीँ तलवार से भी पाँव का कांटा निकलता है !!
जरा सा झुटपुटा होते ही छूप जाता है सूरज भी !
मगर एक चांद है जो शब् में भी तनहा निकलता है !!
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